गलत कुछ यूँ होने लगा है,
काजल ज़रा गहरा होने लगा है
मुस्कराहट चेहरे को छोड़ती नहीं ,
की नज़ाकत निगाहों से जाते नहीं जाती।
अटक सा गया हैं ज़ुबाँ पर उनका नाम ,
थकती नहीं उन्हें निहारते
उनको पाने की तलब का सिलसिला कुछ इस कदर बढ़ने लगा है,
की मुलाकातों का सैलाब सा उमड़ने लगा है।
ए खुदा , इज़हार -ए -मोहब्बत भी अब youtube पर ही करें क्या ?