मेरे कमरे का मंज़र कुछ यूँ है ,
कि बहरी हो गई हैं दीवारें,
सुन मेरी चीखें , लाचार पुकारें |
मानों , दरवाज़ा ज़ंग खा गया है ,
मेरे लगातार बेबस खटखटाने से |
धूल से ढका यह आइना,
भयानक सच दिखाने से कतराने लगा है|
मेरी धँसी आँखों में दफ़्न आँसू देख ,
घड़ी के कांटें सुन्न पड़ गए हैं |
सामने दीवार पर टंगे गाँधी ,
मेरे सिगरेट से सुलगाए बदन को निहारते हैं ,
एकटक , निःशब्द |
टूटा बल्ब जैसे कोई इनायत हो ,
मेरे जख्मी पिंजर पर |
सोचती हूँ,हैवान उजाले से तो खाली अंधेरा ही अपना है|
कि बहरी हो गई हैं दीवारें,
सुन मेरी चीखें , लाचार पुकारें |
मानों , दरवाज़ा ज़ंग खा गया है ,
मेरे लगातार बेबस खटखटाने से |
धूल से ढका यह आइना,
भयानक सच दिखाने से कतराने लगा है|
मेरी धँसी आँखों में दफ़्न आँसू देख ,
घड़ी के कांटें सुन्न पड़ गए हैं |
सामने दीवार पर टंगे गाँधी ,
मेरे सिगरेट से सुलगाए बदन को निहारते हैं ,
एकटक , निःशब्द |
टूटा बल्ब जैसे कोई इनायत हो ,
मेरे जख्मी पिंजर पर |
सोचती हूँ,हैवान उजाले से तो खाली अंधेरा ही अपना है|