Monday, 1 December 2014

Gustakh Khushfehmiyaan


गलत कुछ यूँ होने लगा है,
काजल ज़रा  गहरा होने लगा है
मुस्कराहट चेहरे को छोड़ती नहीं ,
की नज़ाकत निगाहों से जाते नहीं जाती।  

अटक सा गया हैं ज़ुबाँ पर उनका नाम ,
थकती नहीं उन्हें निहारते 
उनको पाने की तलब का सिलसिला कुछ इस कदर बढ़ने लगा है,
की मुलाकातों का सैलाब सा उमड़ने लगा है। 

ए खुदा , इज़हार -ए -मोहब्बत  भी अब  youtube पर  ही करें क्या ?





2 comments:

  1. वाह अदभुत विचारों का अथथाह सागर है आपके पास

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