Thursday, 2 July 2015

उसे नदी होना था

वो लड़की अक्सर हर छोटी छोटी बात का तर्क ढूंढती ,
चलती हवा में बहती पुरानी खुशबू का , टूटे पत्तों की आहट में छिपी उदासी का और
 नींद से  अचानक उठकर  समय को रोक ने की नयी नयी तरकीबें सोचती ,
अब वो पहले जैसी नहीं रही थी
उसे शेहेर का दौड़ता समय काटने लगा  था,
 इंतज़ार ऐसा था जैसे मौत , हर नब्बे सेकंड की  रेड लाइट पे वह थोड़ा मर जाती ,
और भीड़  देख उसके  हाथ पाओ फूलने लगते ,
उसे लोगों से  और उनके इरादों से डर लगने लगा था ,और
डर लगने लगा था खुदसे और खुद की अवास्तविक दुनिया से ,
उसे लगने लगा जैसे वो खुद को खोती  जा रही है.
वो घंटो तारों से बातें करती ,
लापता लोगों के निशाँ तलाशती
बेनाम कवियों  की कविताएं सहेजती ,
चिठियां लिखती , खूब सारी चिठियां , खाली अस्तित्वहीन  पते पर ,
नहीं , वो  पागल नहीं थी ,
वो बस अब पहले जैसी नहीं रही थी
दुनियादारी से कोसो दूर , वह अपना एक ठिकाना ढूंढ रही थी
कहीं दूर, बहुत दूर , जहां मिलते हो पीले पत्ते , उदास  लटकते  लैटरबॉक्स , सुखद प्याऊ , रंग बिरंगी घर ,भटकते बंजारे और जहां कभी ना होती हो रात।

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4 comments:

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  2. बेहतर कविता मालविका... लिखती रहो... ज़्यादा लिखो और अक्सर लिखो... और ख़ुद से कहती हो उसे दस्तावेज़ कर दो... दादा का बहुत बहुत दुलार मेरी बच्ची।

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