Thursday, 1 January 2015

हब्स

मेरे कमरे का मंज़र कुछ यूँ है ,
कि बहरी हो गई हैं दीवारें,
सुन मेरी चीखें , लाचार पुकारें |

मानों , दरवाज़ा ज़ंग खा गया है ,
मेरे लगातार बेबस खटखटाने से |

धूल से ढका यह आइना,
भयानक सच दिखाने से कतराने लगा है| 

मेरी धँसी आँखों में दफ़्न आँसू देख ,
घड़ी के कांटें सुन्न पड़ गए हैं | 

सामने दीवार पर टंगे गाँधी , 
मेरे सिगरेट से सुलगाए बदन को निहारते हैं , 
एकटक , निःशब्द | 

टूटा बल्ब जैसे कोई इनायत हो , 
मेरे जख्मी पिंजर पर |

सोचती हूँ,हैवान उजाले से तो खाली अंधेरा ही अपना है|


2 comments:

  1. This is awesome! The image is so clear and hits so hard..

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  2. क्या बात है ••••••मतलब कैसे???? भाईसाब जबरदस्त

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