Saturday, 21 March 2015

15-01-2015

तेरे खतों के सहारे ही सही
ज़िंदा हूँ ,
मक़बरा नहीं हुई हूँ

हाँ, तेरी तसवीरें देख सिहर उठती हूँ,
तेरी  मौजूदगी  के लिए तरसती हूँ
पर अभी ज़िंदा हूँ'

भीड़ में तेरे इत्र की खुशबू संग बहती चली जाती हूँ ..
तेरी यादों के भवंडर में गुम जाने को।

तेरे कुर्ते से लिपट , बेजान ,
तेरे चेहरे को इस कमरे के खालीपन में तराशती हूँ ,
तेरी खुशबू को सहेजने की नाकाम  कोशिश  करती हूँ ,
 एक बार फिर मर  जाने को।

तेरी मोहब्बत के लिए झटपटाती  हूँ
पर अभी ज़िंदा हूँ ,
मक़बरा नहीं हुई हूँ ...  

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